अंतर्द्वद्व…

कितना मैला हो गया हैं अब…मेरे कमरे का वो आईना… ना ठीक से मैं ख़ुद को देख पाता हूँ… ना ठीक से वो ख़ुद नज़र आता हैं… बस एक कोने में रहता हैं…मालूम हैं शायद उसे…कि कोई और भी रहता हैं…उसके संग… उसी कमरे में… ज़रा सी भी कोशिश नहीं करता…ज़रा सी उम्मीद भी नहीं […]

अंतर्द्वद्व…
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